सब कुछ बना लिया हमने पर देश बनाना भूल गए।
रेल,सडक, पुल, बाँध बनाये, उद्योगो के जाल बिछाऐ।अस्त्र शस्त्र हथियार बनाये, भव्य भवन भंडार बनाये।धन-दोलत की दोड में, घर परिवार बचाना भूल गए
सब कुछ बना लिया हमने पर देश बनाना भूल गए।
गाँव की सौंधी मिट्टी छोडी, शहर के पत्थर चुनने में।बरगद, नीम की छांव छोडी कोरे सप्ने बुनने में ।हरी
-हरी पगड्ण्डी छोड कर पहँउच गये हम जंगल में ।कुछ ना मिला करने को तो पहुच गये सन्तों के परवच्नो के आडम्बर में
भरे परिवार तोड के दीवार बना ली आँग़न में।भाई-भाई के खून का प्यासा आग लगा ली सावन में ।टी
वी ने तो निक्म्मा बनाया ओर बनाया बेरोज़्गारी ने ।खडे कर दिये नये बेरोज़्गार रोज़ हमारी मेहेगाई ने।
सत्य न्याय बेहोश पडे हे न्यायालय ओर राज दरबारो में ।शर्म- हया तक गिरवी रख दी पच्छिम के बाजारो में ।मय
खानो मे डुब गए गंगा मे नहाना भूल गए।सब कुछ बना लिया हमने पर देश बनाना भूल गए।
न्ग्न नारीयाँ न्ग्न त्माशे न्ग्न नुमाइश लगती हें
जाने क्या क्या होता हे तब विश्व सुंदरी बनती हें ।ये ही सुन्दरी टी वी पर फ़िर विज्ञापन मे भी दिखती हे्।मल्टीनेशनल कम्प्नी के नाम पे साबुन तेल भी बेचती हे्।
न्याय की खुल कर बोली लगती, दलालो की मण्डी मे।न्यायाधीश भी बिक जाते हे हरे नोटो की गड्डी मे।सँसद
बना राजनीति का कोठा,नेताओ का इमान बिका।चंद रुप्ये की खातिर वोट बिका इंसान बिका।
सियासत के गलियारों मे घर बिका गाँव बिकाअमर शहीदो के भारत मे बिसिम्ल का नामो निशान बिका।गाँधी
बिका, अश्फ़ाक बिका, राम बिका ,रहमान बिक्।ओर कुछ ना मिला तो धर्म बिका इन्सान बिका।विदेशी पहनावे कि फ़िराक में नोटो मे हिन्दुस्तान बिका।
ज्न्मी नही फ़िर कोइ लश्र्मी बाई इस धरती की माटी ने।सँसद मे फ़ूलन भिज्वा दी पर चम्ब्ल की घाटी ने।चम्ब्ल
मे रही सुरक्षित पर दिल्ली मे हार गई।राजनीति की छ्दम गोलियां फ़ूलन को भी मार गई।आग
लगाना सीख गये हम आग बुझाना भूल गये।सब कुछ बना लिया हमने पर देश बनाना भूल गए
by Rohit Sharma